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ज़कात की रक़म को बैतुलमाल के ज़रिये एक जगह जमा करने की कोशिश .

ज़कात की रक़म को बैतुलमाल के ज़रिये एक जगह जमा करने की कोशिश .

20150619_181857abu obaida 9838033331 अपनी याददाश्त पर जोर दीजिये  और याद कीजिए की क्या आप ने कभी सिख क़ौम के किसी व्यक्ति को भीख मांगते देखा है?शायद नहीं देखा हो गा क्यूंकि सिख क़ौम वाक़ई भीख नहीं मांगती /ऐसा   इस लिए है की सिख भाई अपने गुरु  गुरु नानक जी की बातों और शिक्षा पर सही तरीके से अमल करते हैं जिसमे एक ज़रूरी शिक्षा है मेह्नत  कर के कमाना और अपनी खून पसीने की गाढ़ी कमाई का दशवंत यानि दस प्रतिशत हिस्सा जरूरत मन्दो में बांटना  / ऐसा ही आदेश इस्लाम मज़हब में भी है जिस के तहत ज़कात के रूप में मुसलमानो को अपनी हलाल कमाई का ढाई प्रतिशत भाग गरीबों और मिस्कीनों को देना होता है ये उन लोगों पर लागू है जिन की हैसियत साढ़े सात तोला सोना या ५२ तोले चांदी की है / हर साल निकलने वाली इस ज़कात की रकम इतनी बड़ी है की इस से भारत में कई विश्वविद्दालय खोले जा सकते हैं हज़ारों बड़े उधोग लगाये जा सकते हैं जिनमे लाखों लोगोँ  को रोज़गार मिल सकता है /मुस्लमान इस बात से खुश हो सकते हैं की इस्लाम ने उन्हें एक असाधारण आर्थिक व्यवस्था प्रदान की मगर दुखी इस बात से है की उनके ज़रिये निकाली गई ज़कात का वितरण सही ढंग से नहीं हो पाता नतीजे में मुसलमानो की बदहाली ख़त्म नहीं हो रही / ऐसा भी नहीं है की इस व्यवस्था को इस्लाम के मानने वाले ठीक नहीं करना चाहते ,कई मुस्लिम बुद्धिजीवी सालो से कोशिस में लगे हैं की ज़कात के फंड को बैतुलमाल (इस्लामिक बैंक)के ज़रिये केंद्रित करके ज़रूरतमंदों को वितरित किया जाये जिस से ज़कात की रक़म भिखारियों में बंटने के बजाये सही हक़दार तक पहुंचे और उस रक़म का उपयोग कारोबार में कर के अपनी आर्थिक स्थिति को मज़बूत करे / अगर ज़कात की रक़म भीख  मांगने वालों को न देकर किसी बेरोज़गार को व्यापार कराया जाये तो निश्चित तौर पर न सिर्फ मुसलमानो की गरीबी दूर हो गी बल्कि देश में विकास की राहें हमवार हों गी / ज़कात को बैतुलमाल के ज़रिये एक जगह जमा और वितरण की मुहिम को अमली जामा पहनाने की कोशिश में सालों  से जुटे ऑल इंडिया सुन्नी उलेमा कौंसिल के महा सचिव हाजी  मोहम्मद सलीस की सराहना तो मुस्लिम समाज करता है मगर बैतुलमाल की स्थापना के लिए  रणनीति नहीं बन पाती /हाजी सलीस और कई मुस्लिम बुद्धिजीवी कहते है की मस्जिदों से इसकी शुरुआत हो सकती है जहाँ क्षेत्रीय लोग अपनी ज़कात का पैसा जमा कर सकते हैं और मस्जिदों से पैसा केंद्रीय बैतुलमाल में जमा कर के मुस्तेहक़ीन को वितरित किया जा सकता है / 20150325_02121420141113_024814सलीस के अनुसार ये कोई मुश्किल काम नहीं है बशर्ते ठोस क़दम उठाया जाये / आम मुसलमान जो हर साल अपने माल की ज़कात निकालता है उसे इंतज़ार है की कब ये नेक काम शुरू होगा और कब मुस्लमान आर्थिक रूप से सुदृढ़ हो कर देश की तरक़्क़ी में अपना योगदान बढ़ा सके गे /हाजी सलीस दावा  करते हैं की जिस दिन मुसलमानो का पैसा बैतुलमाल में जमा होकर ज़रूरतमंदों के लिए उपलब्ध हो गा उस दिन से मुसलमानो को किसी के आगे हाथ फैलाने की ज़रुरत नहीं पड़े की न ही उसे राज्य या केंद्र सरकार से किसी आरक्षण की दरकार होगी / आप को हिन्दुस्तान में हुए सांप्रदायिक दंगे तो याद हों गे ?उनमे तबाह हुए लोगों की कहानियां सुनी पढ़ी होंगी पिछले साल उत्तरप्रदेश सरकार ने ८४ के सिख दंगा पीड़ितों की मदद का एलान किया था जिसकी सराहना हाजी सलीस करते हैं मगर २०१३ के अंत में मुज़फ्फरनगर के दंगे हों या १९८७ में हुआ हाशिमपुरा नरसंहार का मारा ग़रीब मुसलमान जिन्हें पिछले महीने मुलायम  सिंह यादव ने पांच लाख रूपये की सहायता राशि का आश्वासन दिया था उन्हें इस भीख की ज़रूरत नहीं पड़े गी अगर मुसलमानों की ज़कात का पैसा बैतुलमाल के ज़रिये एक जगह जमा होकर हकीकी ज़रूरतमंदों को दे दिया जाये .ये काम तभी हो सकता है जब मुसलमान एक हों और बिना मस्लको में बंटे अपनी ज़कात को केन्द्रित करें .कुछ लोगों ने बैतुलमाल की स्थापना की है मगर वो अपनी बिरादरी तक ही सीमित है यानी ज़कात के फंड से उसी बिरादरी को मदद की जाती है  दूसरी को नहीं .मुस्लिम बुद्धिजीवी कहते हैं की सिस्टम बहुत ही बिगड़ चुका है जिसे ठीक कर लिया जाये तो ज़कात के साथ गैर सूदी इस्लामिक बैंक भी वजूद में आसकता है और मुसलमानों की आर्थिक स्थिति मज़बूत हो सकती है बशर्ते पूरे देश में कोई ठोस शुरुआत हो और बैतुलमाल का कयाम अमल में आसके .

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