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ई-रिक्शा चलाकर बेटियों को इंग्लिश स्कूल में पढ़ा रही मां

ई-रिक्शा चलाकर बेटियों को इंग्लिश स्कूल में पढ़ा रही मां

14aकानपुर।  मदर्स डे पर आपको शहर की एक ऐसी मां से मिलाते है जो अपनी मासूम बच्चियों के लिए रिक्शा चलाकर उनका पालन-पोषण करती है।
सड़क के किनारे तिरपाल डाल कर रहने वाली महिला का जज्बा देखिए कि अपनी बच्चियों को इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ा रही है। उनके इस जज्बे को देखकर पूरे इलाके के लोग उसे सलाम करता है। लेकिन सड़क के किनारे रहने और उसकी जिंदगी बर्बाद करने में उसके अपनों का ही हाथ है। बावजूद इसके वह खुद्दारी के साथ जी रही है।
 नौबस्ता थाना क्षेत्र के आवास विकास हंसपुरम इलाके में सड़क के किनारे रहने वाली शीलू कश्यप (26) दो बेटियों वंशिका (08) और परी (05) के साथ तिरपाल डाल कर जिन्दगी काट रही हैं। वह दिन रात रिक्शा चलाकर कर दो वक्त की रोटी और बच्चों की पढ़ाई के लिए रूपए जमा करती हैं। ताकि उसने जो बुरे दिन देखे हैं वह दिन उसकी बेटियों को नहीं देखना पड़े। शीलू के इस जज्बे को देख कर पूरा क्षेत्र उसका कायल है।
शीलू की कहानी
शीलू के मुताबिक उसके परिजन मूलरूप से एमपी के बिलग्राम के रहने वाले थे लेकिन जब वह ढाई साल की थी तभी उसके सिर से उनका साया उठ गया। इसके बाद वह अपने भाई रामू के साथ कानपुर के पटकापुर में रहने लगी।
सास और पति ने करवा दिया था गर्भपात
शीलू ने बताया कि रामू का एक दोस्त नरेश कश्यप था। उसने रहने के लिए एक कमरा दिया था। 13 साल की उम्र में नरेश ने मेरे साथ जबरन रेप किया था और गर्भवती होने के बाद जब इसकी भनक मेरे भाई व पूरे मोहल्ले को हो गई तो नरेश ने मंदिर में मुझसे शादी कर ली थी। लेकिन उसके परिजन राजी नहीं थे। शादी के कुछ महीने बाद उसके घर वालों ने स्वीकार कर लिया था। लेकिन मेरी सास व पति ने सातवें माह में मेरा गर्भपात जबरन करा दिया था। इसके बाद एक बेटी हुई जिसका नाम पलक है। वह अपने पिता के साथ रहती है।
नहीं देते थे हफ्तों खाना
बेटी होने के बाद भी पति व सास ससुर का अत्याचार रुकने का नाम नहीं ले रहा था। वह आए दिन मेरे साथ मारपीट करते थे। एक-एक हफ्ते तक खाना नहीं देते देते थे। कमरे में बंद करके रखते थे, लेकिन मेरे पड़ोसी चोरी छिप कर मुझे रोटियां दे जाते थे। शीलू ने बताया कि जब तीसरी बार गर्भवती हुई तो फिर से बेटी हुई। इस बार सास ने तो रहना ही मुश्किल कर दिया। इस बात से नाराज पति ने बेटी के जन्म के बाद उसकी जमकर पिटाई कर दी थी।
दो साल तक चलाया पैडल वाला रिक्शा
जब सबसे छोटी बेटी परी को होना था तो उन्होंने मुझे घर से बाहर निकाल दिया था जिससे मैंने उसे कब्रिस्तान में जन्म दिया था। लेकिन इसके बाद उन लोगों ने मुझे घर में नहीं घुसने दिया। 20 साल की उम्र में वंसिका और परी को लेकर नौबस्ता क्षेत्र में टेंट लगा कर रहने लगी। बच्चों को पालने के लिए दो साल तक मजदूरी की इसके बाद पैडल वाला रिक्शा चलाया ताकि अपने बच्चियों के लिए खाना जुटा सकू।
काम के दौरान मिला ई रिक्शा
इसके बाद दादा नगर में एक फैक्ट्री में नौकरी की। उसी दौरान मेरी मुलाकात गोमती शुक्ला नाम की महिला से हुई। उनको जब आपबीती बताई तो उन्होंने नौ महीने पहले ही मुझे एक ई रिक्शा दिलाया है। जिसको चलाकर अपने परिवार का पालन पोषण कर रही हूं।
इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ती है दोनों बेटियां
शीलू के मुताबिक अपनी दोनों बच्चियों का दाखिला एमएसआरडी इंग्लिश मीडियम स्कूल में कराया है। यह स्कूल खाड़ेेपुर में है। बच्चों को लेने और ले जाने के लिए स्कूल वैन आती है। शीलू का कहना है कि मैं एक मां हूं। मैंने जिस तरह की समस्याओं का सामना किया है मैं नहीं चाहती कि मेरी बेटियां भी उनका सामना करें। वह पढ़-लिख कर आगे बढ़े। उनको पढ़ाने के लिए मैं दिन रात मेहनत करती हूं। बच्चों की स्कूल फीस दो हजार रूपए महीने है। इसके साथ ही अभी मैं रिक्शे की किश्तें भी भर रही हूं।
वंशिका को है मां पर गर्व
शीलू ने बताया कि मैं एक लड़की होकर रिक्शा चलती हूं। तो लोग मेरा मजाक उड़ाते हैं। लेकिन मुझे इसकी परवाह नहीं क्योंकि मैं अपनी बच्चियों के लिए यह सब कर रही हूं। सर्दी, बरसात, गर्मी हम सब एक साथ इसी तिरपाल के नीचे ही काटते हैं। लेकिन मुझे खुशी इसी बात की है कि मेरे बच्चे स्कूल तो जा रहे हैं। वंसिका का कहना है कि माई मदर इज ग्रेट मदर मुझे गर्व है कि मैं उनकी बेटी हूं।

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