Wednesday , 8 December 2021
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कानपुर .कत्ल खाने खत्म कर दें गे दुधारू भैंस की नस्ल ?

कानपुर .कत्ल खाने खत्म कर दें गे दुधारू भैंस की नस्ल ?

20150807_192514 copyabu obaida 9838033331  (chief editor )snn वो दिन दूर नहीं जब हमे अपने बच्चों को भैंस का चित्र दिखा कर समझाना पड़े गा की भैंस ऐसी होती थी। हमें अपने बच्चों को यक़ीन दिलाना होगा की माँ के बाद जिसका दूध पीकर दारा सिंह जैसे पहलवानों ने भारत का नाम रौशन किया उसे भैंस कहते हैं। हमें अपनी भावी पीढ़ी को इस बात का भी यक़ीन दिलाना होगा की हम ने भैंस को अपनी आँखों से देखा है।ये बातें मैं इस लिए लिख रहा हूँ की आज से कुछ साल बाद ऐसा हकीकत में तब्दील होने जा रहा है वजह है भारत में बिना किसी ठोस  नीति के क़त्ल खानों का वजूद जो अपने करोड़ों के मुनाफे के लिए दुधारू भैंसों को काट कर मीट विदेशों में निर्यात कर रहे हैं।पूरे भारत में ऐसे हज़ारों पशु वध शालाएं हैं जहाँ लाखों भैंसें रोज़ काटी जाती हैं और मीट को सऊदी अरब,अफ़्रीकी देशों सहित दुनिया के अन्य मुल्कों में एक्सपोर्ट किया जाता है।यूं तो  सभी स्लाटर हाउसों को भारत सरकार से बाक़ायदा लाइसेंस प्राप्त है मगर कुछ शर्तों के साथ जिसका पालन किया जाये तो मीट निर्यातक लाखों के घाटे में आ जाएँ मगर सरकारी तंत्र के खेल से क़त्ल खाने चलाने वाले हज़ारों करोड़ के मुनाफे में हैं।slaughter वजह साफ है की जिस स्लाटर हाउस को २०० भैंस प्रति दिन काटने की इजाज़त है वो औसतन २००० भैंसे रोज़ काटता है जिस के लिए पर्यावरण एवं प्रदूषण नियंत्रण विभाग को मोटी रक़म अदा की जाती है। इसी तरह से बड़ी कंपनियां जिन्हे ५०० भैंसे रोज़ काटने का लाइसेंस मिला है वो उसी अनुपात में अधिक जानवर काट कर चांदी बटोर रहे हैं।इस गोरखधंधे से लोकल स्तर पर बिकने वाला भैंस का गोश्त तो महंगा हुआ ही है दूध के दाम भी आसमान पर पहुंच चुके हैं।ऐसा नहीं है की स्थानीय स्तर पर भैंस के गोश्त के कारोबार की मनाही है ,आज भी नगर निगम द्वारा संचालित स्लाटर हाउस हैं जिनमे नगर निगम या नगर पालिका के डाक्टर मीट की जांच कर मोहर लगाते हैं तब ही बड़े का गोश्त स्थानीय दूकान दारों को बेचा जाता है। लेकिन अब ये सरकारी स्लाटर हाउस इतिहास का हिस्सा बनते जा रहे हैं क्यों की इनमे काम करने वाले व्यापारियों को जानवर नहीं मिल पाते या यूं कहें की व्यापारी दुगने दामों पर खरीद नहीं पाते।गौर तालाब है की जो जानवर स्थानीय स्लाटर के कसाइयों को किसी समय १५ हज़ार का मिलता था उसे निर्यात करने वाले स्लाटर हाउस डेढ़ गुने दामो में खरीद लेते हैं।मजबूरन स्थानीय स्तर पर भी भैंस का कारोबार करने वालों को महंगा सौदा करना पड़ता है  जिस से कानपुर जैसे शहर में भैंस के गोश्त की कीमत १८० से २०० रूपये किलो तक पहुंच गयी है। बेतहाशा दाम बढ़ने से लोकल स्तर पर काटने वाले जानवरों की संख्या घटी  तो दुकानदारों पर रोज़ी रोटी का संकट  भी खड़ा हो गया। अगर कानपुर की बात करें तो यहां लगभग १००० दुकानों में भैंस के मांस का कारोबार होता था जो अब महंगाई की वजह से घट कर २०० से ३०० दुकानो तक सीमित रह गया है। साफ़ है की महंगाई की वजह से आम लोगों ने बड़े गोश्त का उपयोग कम कर दिया है या फिर वो शाकाहार की तरफ जाने को मजबूर हैं। बतादें की बड़े के गोश्त बेचने और खाने वाले एक ही समुदाय के लोग हैं जिनमे आम तौर पर ग़रीब तब्क़ा इस मीट को खरीद कर भोजन के रूप में इस्तेमाल करता था मगर भैंसों की अंधा धुंध कटाई से गरीब के मुह से ये सस्ता निवाला भी छिन  चुका है।images

उपभोक्ता तो भैंस के गोश्त का मोह त्याग कर सब्ज़ी या फिर मुर्गे के गोश्त को अपनी हांडी में पका रहा है मगर उन लाखों व्यापारियों का क्या जिनका पुश्तैनी कारोबार इन अवैध स्लाटर हाउसों की वजह से खत्म हो चुका है। आम तौर पर मुसलमानो में कुरैशी बिरादरी इस कारोबार को भारत में सदियों से करती आई है वो अब  भुखमरी की कगार पर पहुंच चुकी  है। इस व्यवसाय को बचाने के लिए कुरैशी बिरादरी ने कई बार आवाज़ भी उठाई क़त्ल खानो के खिलाफ धरने प्रदर्शन भी किये मगर आधुनिक बूचर खानो के ताक़तवर मालिकों के आगे टिक नहीं पाये और निराश होकर अन्य धंधों की तरफ रुख करने लगे वहीँ ऐसे भी लोग हैं जिन्हे अपने पुश्तैनी व्यवसाय से अधिक भैंसों की नस्ल को बचाने की चिंता सताए जा रही है ऐसे ही एक समाज सेवी है कानपुर  के  हाजी दिलशाद कुरैशी जो तंजीम जमीयतुल क़ुरैश गरीब नवाज़ के बैनर तले इस अवैध कारोबार के विरुद्ध आवाज़ उठाते रहते हैं। हाजी दिलशाद बताते हैं की जिस तेज़ी से भैंस की नस्ल को काट कर विदेशों में बेचा जा रहा है उस से कुछ ही सालों में भारत से भैंस की प्रजाति ढूंढे नहीं मिले गी। उन्हों ने आरोप लगाया की लेटेस्ट तकनीक से सुसज्जित बड़े जानवरों  को काटने वाले कारखानों में मानकों को ताक़ पर रख कर मीट का उत्पादन किया जाता है अपने मुनाफे के लिए ये दुधारू भैंसों की भी बलि चढ़ा देते हैं जिस से दूध की क़िल्लत बढ़ती जा रही है। दिलशाद बताते हैं की दुनिया के कई देशों में ऐसे स्लाटर हैं जिन में सरकार की तरफ से दिए गए मानकों का पालन किया जाता है। ब्राज़ील जैसे देश का हवाला देते हुए कहा की वहाँ से भी बड़े जानवरों का मीट कई देशों में सप्लाई होता है मगर वहाँ बाक़ायदा जानवरों की बड़े पैमाने पर फार्मिंग होती है और तय आयु पर ही जानवरों को काटा जाता है। हाजी दिलशाद ने बताया की भैंस कम से कम तीन साल में जवान होकर बच्चा और दूध देने के क़ाबिल होती है जिस से दूध के उत्पादन के साथ नस्ल भी बढ़ती है कुछ समय तक उससे दुग्ध उयपादन किया जाता है और बच्चे पैदा कराये जाते हैं ताकि  जानवरों की कमी न होने पाये। इस बात का पालन लैटिन अमेरिकी देश ब्राज़ील में तो ईमानदारी से होता है वहीँ भारत में कोई फार्मिंग का नियम नहीं यहाँ तो डेढ़ से दो साल में ही भैंस को छुरी के नीचे लिटा दिया जाता है हद तो ये है की कभी कभी डिमांड होने पर दूध पीते बच्चों को भी काट कर विदेशों में सप्लाई कर दिया जाता है।अगर यूपी की बात करें तो यहां मेरठ ,गाज़ियाबाद ,सहारनपुर मुज़फ्फर नगर ,उनाव आदि शहरों में स्थित मीट कारखानों में रोज़ लाखों जानवर काट दिए जाते हैं वहीँ यूपी के बाहर दिल्ली और अन्य प्रांतों में भी ऐसे कई हज़ार कारखाने है जिन में भैंसों को काटे जाने की तादाद रोज़ाना लाखों में है।कानपुर महा नगर से सटे  उन्नाव ज़िले में अकेले अल्लाना ,जे एस ,रुस्तम ,अल सुपर ,इनायती और मैश इंटर  नेशनल नाम की बड़ी कंपनियां हैं जो रोज़ औसतन पंद्रह हज़ार जानवर काट कर बाहर मुल्कों में सप्लाई कर देते हैं। यहां माल देने वालों की भी कोई कमी नहीं ,बिहार के कई जिलों ,यूपी के वाराणसी मिर्ज़ा पुर ,कानपुर कानपुर देहात ,जालौन आदि और ,पक्षिम बंगाल आदि के जिलों  से ट्रकों  पर लाद कर छोटी से लेकर बड़ी भैंस तक पहुचाई जाती है।केवल उन्नाव जनपद में पुलिस की रोज़ाना लाखों में इन अवैध सप्लायर्स से कमाई होती है।पुलिस की मुठ्ठी इतनी गर्म की जाती है की वो ये भी देखना गवारा नहीं करती की ट्रकों में कौन सा जानवर लाया जा रहा है। अक्सर प्रतिबंधित पशु भी रिश्वत की आड़ में क़त्ल खानो तक पहुँचते हैं जिन्हे कई बार जनता पकड़ती है साम्प्रदायिक तनाव की स्थिती बनती है मगर बंद मुठ्ठी वाली पुलिस मामले को बड़ी होशियारी से सुलझा कर हालात को संभाल लेती है।तंज़ीम जमीयतुल क़ुरैश गरीब नवाज़  के अध्यक्ष हाजी दिलशाद कहते हैं की वह इस लड़ाई को हर स्तर पर लड़ेंगे  क्यूंकि ये लाखों लोगों के रोज़गार से जुड़ा मामला है हाजी ने बताया की अंदर ही अंदर  कुरैशी बिरादरी में आक्रोश बढ़ रहा है यदि सरकारों ने इस संवेदनशील मामले को गंभीरता से  नहीं लिया तो परिणाम घातक हो  सकते हैं और ज़िम्मेदारी हुक्मरानों की होगी। कुरैशी ने आम लोगों  से भी अपील की है की वे  अपने बच्चों को पिलाये  जाने वाले दूध की रक्षा करें और इस मुहिम में उनका  साथ दें ताकि क़त्ल खानों के कारण  बढ़ रही महंगाई को रोका जसके।
जारी है। ….

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