Tuesday , 5 July 2022
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कानपुर.आईजी के रडार से अब बच न पायेंगे थानेदार

कानपुर.आईजी के रडार से अब बच न पायेंगे थानेदार

IMG_6290rajesh misra .कानपुर. Snn.पुलिस की कार्यशैली पर हमेशा समाज की उंगलियाँ उठती रही हैं हालाँकि समय समय पर सरकारों ने इन पर अंकुश लगाने की कोशिश की लेकिन बावजूद इस दिशा में उसे कोई सार्थक सफलता हासिल नहीं हुई .जो हमेशा सरकारों के लिए चिंता का विषय बना रहा और कोई भी सरकार इस चिंता से अभी तक अपने आप को मुक्त नहीं कर पाई .पिछले दिनों कानपुर परिक्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक आशुतोष पाण्डेय ने पुलिस की गिरती हुई छवि को कैसे जनता के बीच कैसे बचाया जाये इसकी पहल करते हुए उन्हों ने पुलिस और आम जनता की दूरी को खत्म करने के लिए “ एक नम्बर भरोसे का” की स्थापना की और उनके अथक प्रयासों से इस नम्बर को सामाजिक मान्यता भी मिलना शुरू होने लगी शायद यही कारण रहा की अपने आई जी  की इस पहल को आगे बढाते हुए इसे प्रदेश स्तर पर सरकार ने मान्यता भी दे दी.अपनी इस उपलब्धि से अपने आप को इसी दिशा में आगे बढाते हुए निचले स्तर पर पुलिस और जनता के बीच अच्छा  संवाद स्थापित हो सके इसके लिए उन्हों ने अब एक नै मुहिम की शुरुआत की है जो थानेदारों की कार्यप्रणाली का आकलन करे गी और इसकी समीक्षा स्वंय आईजी पाण्डेय करें गे .उन्हों ने इस नई मुहिम का नाम दिया है “एक थानेदार भरोसे का “.

इस आशय की घोषणा उन्हों ने ग्वालटोली स्थित अन्त्योदय बाल विद्यालय में आयोजित एक समोरोह के दौरान की . उनका मानना है की इस अभियान के तहत थानेदारों के जनता के साथ बर्ताव का ववह खुद आकलन करें गे और इस मुहिम की कसौटी पर खरा उतरने वाले किसी एक थानेदार को विशेष तौर से पुरस्कृत करें गे .

ब्रिटिश हुक्मरानों ने जब अखंड भारत की धरती पर ईस्ट इंडिया कम्पनी के माध्यम से अपनी जड़ें ज़माने की कोशिश की उस समय उनके साथ आया सैनिक बल यहाँ की आबादी की तुलना में काफी कम था.इस स्थिति को भांप कर उन्हों ने जनता पर आतंक के बल पर राज करने के लिए पुलिस बल का गठन किया और इस बल को सिर्फ और सिर्फ दहशत फैलाने का प्रशिक्षण भी दिया शायद यही कारण रहा की इसी बल के सहारे आज़ादी के आन्दोलन को दबाने के लिए भरपूर ढंग से इसका इस्तेमाल किया .सन १९४७ में जब देश आज़ाद हुआ और पंडित जवाहर लाल नेहरु के नेतृत्व में आज़ाद भारत की सरकार का गठन हुआ हालांकि उस समय देश विभिन्न हालातों से जूझ रहा था उन हालात को नियंत्रित करना सरकार की प्राथमिकता बन गयी और अलग अलग राज्यों के भी गठन की प्रक्रिया अस्तित्व में आने लगी .१९५० में जब भारतीय संविधान की स्थापना हुई उस समय भी पुलिस की कार्य प्रणाली पर कोई लगाम लगाने की पहल नही की गयी .संविधान तो लागू  हो गया और समय समय पर अनेकों बार इसमें संशोधन भी हुए लेकिन रक्षक से भक्षक बन बैठे इस पुलिस बल को रक्षक की भूमिका में लाने  के लिए आज़ादी के बाद से समूचे देश के इक्का दुक्का राज्यों को छोड़ कर कहीं भी कोई सार्थक पहल नहीं हुई और यह पुलिस बर्बरता की हदों को पार करने में लगातार अपने को एकाध अपवाद छोड़ कर हमेशा शिखर पर रही .सरकारों के लाख प्रयासों के बावजूद इनकी गलतियां सुधरने के बजाये बिगडती चली गईं इसमें अनेकों राजनैतिक कारण भी शामिल रहे .आईजी आशुतोष पाण्डेय के मन में पुलिस की बिगड़ी छवि को सुधारने के लिए जो भाव उत्पन्न हुए उसी को श्रन्ख्लाब्द्ध करते हुए अपनी इस नई परिकल्पना को आम जनता के बीच लाने की पहल की .देखना है की एक नम्बर भरोसे की तरह “एक थानेदार भरोसे का “अभियान किस हद तक परवान चढ़ पाता है.

 

 

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