Monday , 18 December 2017
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सफ़रुल मुज़फ़्फ़र ”का महीना और इस्लामी नज़रिया

सफ़रुल मुज़फ़्फ़र ”का महीना और इस्लामी नज़रिया

Najeeb-Qasmi-Photo-1-273x300snn “स़फ़रुल मुज़फ़्फ़र” हिजरी कैलंडर का दूसरा महीना  जो “मुह़र्रमुलह़राम” के बाद और “रबीउलअव्वल” से पहले आता है इस महीने में आम  रूप में  ही इबादत की जाती है यानि कोई ख़ास  इबादत महीने में मसनून या मुस्तह़ब  नहीं है।  ये दूसरों महीनों की तरह ही है यानि ख़ासतौर  इस महीने में आपदा और मुसीबतों के नाज़िल होने  का अक़ीदा रखना ग़लत है।  दौरे जिहालत में इस महीने को मनह़ूस महीना समझा जाता था तब लोग  इस महीने में सफ़र करने से बचते थे अफ़सोस  की बात यह है कि जिहालत  के दौर (अतीत) का ग़लत और भ्रष्ट अक़ीदा सोशल मीडिया पर हमारे ही दीनी भाइयों की तरफ़ से शेयर किया जा रहा है सोशल मीडिया के जहाँ बहुत से फ़ायदें हैं वहीं नुक़सान भी बहुत हैं इनमें से एक यह है कि लोगों की अधिकांश संख्या संदेश  को बिना पढ़े और बिना तहक़ीक़ किए दूसरों को भेज देने वालों की  हैं।  इन संदेशों (मेसेजों) में कभी कभी नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ़ ऐसी बात मनसूब होती है जो नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने ज़िंदगी  में कभी भी नहीं कही ह़ालांकि इस पर सख़्त  चेतावनियां अह़ादीस़ में आई हैं जैसा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: “जो शख़्स़ मेरी निसबत से वह बात बयान करे जो मैंने नहीं कही तो वह अपना ठिकाना  दोज़ख़  में बनाए” (बुख़ारी), नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का यह फ़रमान मुख्तलिफ़ अल्फ़ाज़ (शब्दों) के साथ ह़दीस़ की कई किताबों में दर्ज है।  जिससे मालूम हुआ कि नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कई बार ऐसा करने से सख़्ती के साथ मना किया है, तो नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की तरफ़ मनसूब की हुई कोई भी बात बिना किसी तहक़ीक़ के आगे न भेजें इसी तरह रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का फ़रमान है: “आदमी के झूठा होने के लिए है कि वह हर सुनी सुनाई बात बिना तहक़ीक़ के बयान करे” (मुस्लिम), एक दूसरी ह़दीस़ में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: “जिसने मेरी तरफ़ मंसूब करके जानबूझ कर कोई झूठी ह़दीस़ बयान की तो वह झूठ बोलने वालों में से एक है” (मुस्लिम).

नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने “स़फ़र” के बारे में इस बातिल अक़ीदे का इंकार आज से 1400 साल पहले ही कर दिया था इसीलिए ह़दीस़ की सबसे  भरोसेमंद किताब में उल्लेख  है कि ह़ुज़ूर-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने इरशाद फ़रमाया: “सफ़र” का महिने (में अशुभ (नह़ूसत) होने का अक़ीदा) बे हक़ीक़त बात है” (बुख़ारी) अशुभ (नह़ूसत) तो असल में इन्सान के अमल  में होती है कि वह ख़ालिक़-ए-काएनात  के ह़ुक्म  की  ख़िलाफ़ वर्ज़ी करता है।  ह़ालांकि वह अपने वुजूद और बक़ा  के लिए भी अल्लाह तआला के ह़ुक्म का  मोहताज  है।   एक दिन ऐसा ज़रूर आएगा कि वह भी मौत का मज़ा चख़ लेगा और इसके बाद इन्सान को अपनी ज़िन्दगी के एक एक लम्हा  का हिसाब अल्लाह तआला को देना होगा।  इन्सान की ज़िन्दगी का जो वक़्त भी अल्लाह तआला की नाराज़गी (अप्रसन्नता) में बिताया हक़ीक़त में वह मनहूस है न कि कोई महीना या दिन तो जो इन्सान “स़फ़र” के महीने में अच्छे काम  करेगा तो यही महीना उसके लिए ख़ैर-व-बरकत और सफलता का कारण  बनेगा और इन्सान जिन वक़्तों और महीनों में भी बुरे काम करेगा ज़िन्दगी  के वह पल उसके लिए मनहूस होंगे।  जैसे कि “फ़जर” की नमाज़ के वक़्त  कुछ लोग उठ कर नमाज़ पढ़ते हैं और कुछ लोग बिना तर्क  बिस्तर पर पड़े रहते हैं और नमाज़ नहीं पढ़ते तो एक ही वक़्त  कुछ लोगों के लिए बरकत और कामयाबी  का ज़रियाबना और दूसरों के लिए नहूसत का।  मालूम हुआ कि किसी वक़्त या महीने में नहूसत नहीं होती बल्कि हमारे अमल में बरकत या नहूसत होती है ह़दीस़-ए-क़ुदसी में अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है: “आदम की औलाद ज़माने को गाली देती है और ज़माना को बुरा भला कहती है, ह़ालांकि ज़माना तो मैं हूँ, रात की गर्दिश (गतिविधि) मेरे हाथ में है (बुख़ारी) यानी कुछ लोग ज़माने के संकटों से प्रभावित  होकर ज़माने को बुरा भला कहने लगते हैं, ह़ालांकि ज़माना कोई काम नहीं करता बल्कि ज़माने में घटनाएँ और संकट सामने आते हैं वह अल्लाह तआला की मर्ज़ी और उसके ह़ुक्म से होते हैं/ बहरह़ाल क़ुरान करीम की किसी भी आयत या नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के किसी भी फ़रमान में यह उल्लेख नहीं है कि “स़फ़र” के महीने में नहूसत है या इस महीने में मुसीबतें  और आफ़तें नाज़िल होती हैं।  इसी वजह से पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा का इत्तिफ़ाक़ है कि “स़फ़र” का महीना अन्य  महीनों की तरह है यानि इस महीने में कोई नहूसत नहीं है सीरत-ए-नबवी की कई घटनाएं कुछ सहाबियात की शादियाँ और कई सहाबियों का इस्लाम क़ुबूल करना इसी महीने में हुआ है और अक़ल से भी सोचें कि महिना ज़माना या वक़्त  कैसे और क्यूँ मनहूस  हो सकता है? बल्कि “स़फ़र” के महीने में तो अशुभ  का शक भी नहीं करना चाहिए क्यूंकि इसका नाम “स़फ़रुल मुज़फ़्फ़र” है, जिसका अर्थ ही “कामयाबी  का महीना” हैं।  जिस महीने के नाम में ही खैर और कामयाबी  का अर्थ हो वह कैसे नहूसत का महीना हो सकता है? कुछ लोग यह समझकर कि “स़फ़र” के शुरू के 13 (तेरह) दिनों में आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम बीमार हुए थे, शादी वग़ैरह नहीं करते हैं, बिलकुल ग़लत है क्यूँकी क़ुरान व ह़दीस़ में इस तरह की कोई भी शिक्षा मौजूद नहीं है तथा तहक़ीक़ी बात यह है कि नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम “स़फ़र” के शुरू दिनों में नहीं बल्कि “स़फ़र” के महीने के आख़िरी  दिनों में या “रबीउलअव्वल” के शुरू के दिनों में बीमार हुए थे और रबीउलअव्वल” की बारह (12) तारीख़ को आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की वफ़ात हुई थी। कुछ नावाक़िफ़  लोग “स़फ़र” के महीने के आख़िरी  बुध को ख़ुशी मनाते हैं और मिठाई आदि बांटते हैं जबकि इसकी शरियत-ए-इस्लामिया में कोई ह़क़ीक़त नहीं है क्यूँकि लोगों में यह बात ग़लत मशहूर हो गई है कि इस दिन नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम  सेह़तयाब हो गए थे। ह़ालांकि यह बिलकुल ग़लत है बल्कि कुछ रिवायात में इस दिन में ह़ुज़ूर-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की बीमारी के बढ़ जाने का ज़िक्र मिलता है तो “स़फ़र” के महीने का आख़िरी  बुध मुसलमानों के लिए ख़ुशी का दिन बिलकुल नहीं हो सकता यहूद व नसारा ख़ुश हो सकते हैं हो सकता है यह बात उन्हीं की तरफ़ से फैलाई गई हो।  पूरी दुनिया के मुसलमानों की तरह उपमहाद्वीप के सभी मकातिब-ए-फ़िक्र का भी यही नज़रिया है कि “स़फ़र” के महीने में कोई नहूसत नहीं है।  इसमें शादी वग़ैरह बिलकुल की जा सकती है और “स़फ़र” के महीने के आख़िरी  बुध में ख़ुशी का कोई जश्न मनाना दीन नहीं बल्कि नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शिक्षा के ख़िलाफ़  है। इन दिनों सोशल मीडिया पर किसी भी पैग़ाम को आगे भेजने का सिलसिला बहुत तेज़ी से जारी है, चाहे हम इस पैग़ाम  को पढ़ने की तकलीफ़ गवारा करें या न करें और इसी तरह इसकी तह़क़ीक़ (जाँच) करने की ज़रुरत (आवश्यकता) भी समझें या न समझें कि मैसेज (संदेश) स़ह़ीह़ जानकारी (सूचना) पर शामिल है या झूठ के पुलंदों पर, ह़ालांकि इसको आगे भेजने में बहुत ज़्यादा जल्दबाजी से काम लिया जाता है जबकि मैसेज आगे भेजने के लिए नहीं बल्कि हक़ीक़त में पढ़ने के लिए भेजा गया था।  ग़लत जानकारी  पर शामिल मैसेज को आगे भेजना हमारे लिए जायज़ नहीं।ख़ासकर अगर वह पैग़ाम  दीनी तथ्यों  पर आधारित  हो क्यूँकि इससे ग़लत जानकारी दूसरों तक पहुंचेगी, जैसे कि कभी कभी सोशल मीडिया के ज़रिए पैग़ाम  पहुँचता है कि अल्लाह तआला के 5 नाम किसी भी मुसलमान को भेज दें तो बड़ी से बड़ी परेशानी हल हो जाएगी इसी तरह कोई पोस्ट इतने दोस्तों को भेज दें तो इस से वह वह समस्याएँ दूर हो जाएँगी, परन्तु समस्याएँ और ज़्यादा पैदा होंगी।  इसी तरह कभी कभी सोशल मीडिया पर मैसेज नज़र आता है कि यह पैग़ाम (संदेश) इतने लोगों को भेजने पर जन्नत मिलेगी कभी कभी लिखा होता है कि अल्लाह और उसके रसूल से सच्ची मुहब्बत ना करने वाला ही इस मेसेज  को फॉरवर्ड  नहीं करेगा आदि।  इस तरह के पैग़ाम  का शरियत-ए-इस्लामिया से कोई नाता नहीं है बल्कि यह आम तौर पर झूठ और धोखाधड़ी पर शामिल होते हैं।

मौजूदा दौर में शिक्षा (पढ़ने और पढ़ाने) और जानकारी प्राप्त करने के लिए सोशल मीडिया का भी इस्तेमाल  किया जा रहा है यह भी अल्लाह की एक देन है और  इसका सही ढंग से उपयोग किया जाए। काफी  लोग कुछ पैग़ाम की चमक दमक देख कर उसको बिना पढ़े या बिना तह़क़ीक़  दूसरों को फॉरवर्ड कर  देते हैं अब अगर ग़लत जानकारी पर शामिल कोई पैग़ाम आगे भेजा गया तो वह ग़लत जानकारी हज़ारों लोगों में फैल जाएगी जिसका गुनाह हर उस शख़्स़  पर होगा जो इसका कारण  बन रहा है तो बिना जांचे कोई भी पैग़ाम विशेषकर दीनी सूचना के बारे में फॉरवर्ड  न करें।  जैसा कि अह़ादीस़-ए-रसूल सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की रौशनी में बताया गया है, याद रखें कि इन्सान के मुहं से जो बात निकलती है या वह लिखता है तो वह बात उसके नामा-ए-आमाल में लिखी जाती है जैसा कि अल्लाह तआला का इरशाद है: “इन्सान मुंह से जो लफ्ज़  भी निकालता है उसके पास निगहबान (फ़रिश्ते उसे लिखने के लिए) तैयार रहते हैं” (सुरह क़ाफ़: 18).

इस्लामी तारीख़  गवाह है कि ग़लत ख़बरों के फैलने की वजह से इस्लाम और मुसलमानों को बहुत नुक़सान हुआ है जैसे कि “ग़ज़वा-ए-उहद” के मौक़े पर आप सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के क़त्ल होने की ग़लत ख़बर उड़ा दी गई थी जिसकी वजह से मुसलमानों के पैरों के नीचे से ज़मीन निकल गई थी जिसका नतीजा  तारीख़ की किताबों में मौजूद है।  इसी तरह “ग़ज़वा-ए-बनू मुस्तालिक़” के मौक़े पर मुनाफ़िक़ीन ने ह़ज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा पर इल्ज़ाम  लगा कर ग़लत ख़बर फैलाई थी जिस से नबी-ए-अकरम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की शख्सियत  भी प्रभावित हुई थी, शुरू में यह ख़बर मुनाफ़िक़ीन ने उड़ाई थी परन्तु बाद में कुछ मुसलमान भी अपनी अज्ञानता के कारण इसमें शामिल हो गए थे।  आख़िर में अल्लाह तआला ने अपने पाक (पवित्र) कलाम में ह़ज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की बराअत (मुक्ति) नाज़िल फरमाई और इस घटना में अल्लाह तआला ने झूठी ख़बर फैलाने वालों की निंदा की, जिन्होंने ऐसी ख़बर को फैलाया कि जिसके कारण ह़ज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के दामन-ए-इफ़्फ़त व इज़्ज़त को दाग़दार करने की शर्मनाक कोशिश की गई थी बारी तआला का इरशाद है: “उनमें से हर एक शख़्स़ पर इतना गुनाह है जितना उसने कमाया है, और उनमें से जिसने इसके बहुत बड़े हिस्से को सरअंजाम दिया है, उसके लिए अज़ाब भी बहुत बड़ा है”, (सुरह अल-नूर: 11).

इसी तरह आज कुछ वेबसाइटस इस्लाम के बारे में विभिन्न विषयों पर जनमत संग्रह  कराती रहती हैं इन रेफिरेंडम  में हमारे कुछ भाई बहुत जज़बात के साथ भाग लेते हैं और अपनी क्षमताओं  का एक हिस्सा इसमें लगा देते हैं।  आम तौर पर इस तरह की सभी वेबसाइटस इस्लाम के ख़िलाफ़  साज़िश  करने के लिए ही इस्तेमाल की जाती हैं, इन पर कोई ध्यान नहीं देना चाहिए जैसा कि अल्लाह तआला ने इरशाद फ़रमाया: “ऐ ईमान वालों! अगर तुम्हें कोई फ़ासिक़ ख़बर दे तो तुम उसकी अच्छी तरह तह़क़ीक़(छान बीन) कर लिया करो ऐसा न हो कि नादानी  में किसी क़ौम को तकलीफ़ पहुँचा दो फिर अपने किये पर पछताओ” (सुरह अल-हुजुरात: 6), तथा अल्लाह तआला ने ने इरशाद फ़रमाया: “जो लोग मुसलमानों में बेहयाई फैलाने की चाहत में रहते हैं उनके लिए दुनिया व आख़िरत में दर्दनाक अज़ाब है “सुरह अल-नूर: 19).

ख़ुलासा-ए-कलाम (सारांश): सोशल मीडिया को हमें अपने व्यक्तिगत शिक्षित, सामाजिक व व्यावसायिक (तिजारती) पोस्टों के साथ साथ ज़्यादा से ज़्यादा दीन-ए-इस्लाम की तबलीग़ और उलूम-ए-नुबुव्वत को फैलाने के लिए इस्तेमाल करना चाहिए, क्यूंकि मौजूदा दौर में यही एक ऐसा मीडिया है जिसके ज़रिए हम अपनी बात दूसरों तक आसानी के साथ पहुँचा सकते हैं, वरना इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया तो आम तौर पर मुस्लिम मुख़ालिफ़  ताक़तों के पास है तथा अगर स़ह़ीह़ दीनी मालूमात पर शामिल कोई पैग़ाम भरोसेमंद  सूत्रों के ज़रिए से आप तक पहुँचे तो आप इस पैग़ाम को पढ़ें भी तथा अपनी क्षमता के अनुसार अधिक से अधिक लोगों को भी फॉरवर्ड  करें ताकि इस्लाम और उसके तमाम उलूम की ज़्यादा से ज़्यादा इशाअत  हो सके। अगर आपके पास कोई पैग़ाम ग़ैरभरोसेमंद  के ज़रिए से आप तक पहुँचे तो आप इस पैग़ाम  को बिना तह़क़ीक़  किए बिलकुल फॉरवर्ड न करें, “स़फ़र” के महीने के अशुभ (मनहूस) होने या इस में मुसीबतें और आपदा के उतरने के बारे में कोई एक रिवायत भी मौजूद नहीं है और न ही आज तक किसी भरोसेमंद आलिम-ए-दीन ने इस को माना है, तो इस तरह के पैग़ाम  को बिलकुल भी दूसरों को न भेजें बल्कि उन्हें तुरंत डिलीट कर दें। (डॉ॰ मुहम्मद नजीब क़ासमी संभली)

 

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