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अधूरे ज्ञान के ज़रिये इस्लाम को बदनाम करने की साज़िश -मौलाना ओसामा

अधूरे ज्ञान के ज़रिये इस्लाम को बदनाम करने की साज़िश -मौलाना ओसामा

01aabu obaida 98380 33331 कानपुर। अमन का पैगाम देने वाले मज़हबे इस्लाम को आज पूरे विश्व में आधे अधूरे इल्म के ज़रिये बदनाम करने की कोशिशे की जा रही हैं। विश्व मीडिया के साथ भारतीय मीडिया भी इस्लाम के बारे में पुख्ता जानकारी किये बिना ही लोगों तक इस्लाम की गलत तस्वीर पेश करता है जिस से आम लोगों में इस्लाम के प्रति गलत धारणा पनपने लगती है और लोग उन मीडिया रिपोर्ट्स को सच मान कर इस्लाम के प्रति अपना नज़रया बना लेते हैं जब कि  इस्लाम पूरी तरह साफ़ सुथरा और मुकम्मल मज़हब है जिसमे मर्दों और औरतों को बराबरी के पूरे हुकूक दिए गए हैं।इस्लाम ही ऐसा धर्म है जिसमे न कोई  छोटा है न बड़ा है।अल्लाह ने कुरान के ज़रिये एक ऐसा क़ानून दुनिया को दिया जिस पर अमल करके पूरी दुनिया चैन से जी सकती है। अगर  कुरआन की सही शिक्षाओं पर अमल किया जाए तो कोई किसी को एक थप्पड़ भी न मारे।यह बातें आल इंडिया इस्लामिक एकेडमी के एक सेमीनार में अकेडमी के क़ौमी सदर कार्यवाहक शहर क़ाज़ी मौलाना मतीनुलहक़ ओसामा कासिमी ने कहीं। रागेन्द्र स्वरुप आडिटोरियम में  हुए मुस्लिम पर्सनल लॉ और वकीलों की ज़िमेदारी विषयक सेमीनार में एडिशनल एडवोकेट जफरयाब जिलानी बतौर मुख्य अतिथि शामिल हुए।
सेमीनार में एकेडमी से जुड़े मुफ्तियान ने स्पष्ट किया कि मुस्लिम पर्सनल लॉ फ़िक़ह के आधार पर मसलों को हल करता है न की कुरआन की रौशनी में। उन्हों ने कुरआन की आयतों के हवाले देते हुए कहा कि कुछ जगह शौहर को मिस्वाक से पत्नी को पीटने की बात कही गयी है जिसके आधार पर अदालत और वकील यह मान लेते है कि कुरआन पत्नी को मारने की इजाज़त देता है जबकि फ़िक़ह की रोशनी में सामाजि तौर पर शरई अदालतों में तलाक़ निकाह और विरासत के मामले निपटाये जाते हैं।कहा गया कि अदालते शरिया को भारतीय संविधान के साथ नहीं जोड़ा जासकता। शरई मसले को समझने के लिए हमारे वकील साहेबान और जजों को आपस में बात करनी होगी ताकि भविष्य में होने वाले ऐसे विवादों से बचा जासके।
इस मौके पर एडिशनल एडवोकेट जनरल यूपी सरकार जफरयाब जिलानी ने कहा कि शरई अदालतों के ज़रिये मुल्क भर में मुसलमानो से जुड़े हज़ारों मसलों का हल बखूबी तलाश कर लोगों को राहत दी जाती है और दी जा रही है जोकि क़ाबिले तारीफ है। लोग मामूली तलाक़ के मुकदमो में सालों अदालतों और वकीलों के चक्क्र में फंस कर अपना वक़्त और पैसा बर्बाद करते हैं और नतीजे में रुस्वाई ही हाथ आती है।जबकि शरिया अदालतों पर भरोसा करने वालों को केवल ४०० में क़ुरआन और सुन्नत की रौशनी में सही फैसला मिल जाता है।
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zafaryab jilaniबाबरी मस्जिद राम मंदिर के टाइटल सूट का  फैसला अभी दूर है क्यूंकि सुरीम कोर्ट में दाखिल किये जाने वाले दस्तावेज़ों का अभी अंग्रेजी अनुवाद पूरा नहीं किया जासका है। इसमें काम से ६ महीने या उससे भी अधिक समय लग सकता है। उसके बाद ही फ़ाइल अदालत के सामने जाए गी। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी द्वारा बाबरी मस्जिद मामले में खुद को पार्टी बनाये जाने की रिट को सुप्रीम कोर्ट द्वारा स्वीकार किये जाने पर पर्सनललॉ बोर्ड ने अपना जवाब दाखिल कर दिया है।मामला कोर्ट में है इसलिए ज़्यादा टिप्पणी नही की जासकती।
ज़फरयाब जिलानी
एडिशनल एडवोकेट जनरल यूपी

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