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43 फीसदी अंक की वृद्धि से विश्वविद्यालय की पारदर्शिता पर उठे सवाल

43 फीसदी अंक की वृद्धि से विश्वविद्यालय की पारदर्शिता पर उठे सवाल

कानपुर, 03 नवम्बर । छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय परीक्षाओं में पारदर्शिता लाने के लिए बराबर बदलाव कर रहा है लेकिन बाबुओं का खेल बदस्तूर अभी भी जारी है। इसके चलते जो छात्रा पहले वर्ष किसी तरह से पास हुई, वही छात्रा अगले वर्ष 43 फीसदी अंक की वृद्धि के साथ मेरिट में तीसरे स्थान पर पहुंच गई। इस वजह से विश्वविद्यालय की पारदर्शिता पर लोग सवाल उठाने लगे हैं। हालांकि विश्वविद्यालय प्रशासन पूरे मामले को लेकर जांच शुरू कर दी है।छत्रपति शाहू जी महाराज विश्वविद्यालय से सम्बद्ध डीएवी कॉलेज से एक छात्रा जुलोजी से एमएससी कर रही थी। छात्रा को प्रथम वर्ष की लिखित परीक्षा में क्रमशः 29, 40, 46, 42 व 25 अंक मिले थे। यह सभी प्रश्न पत्र 80 अंक के थे, यानी छात्रा को लिखित परीक्षा में 45.5 फीसदी अंक मिले। इसके साथ ही छात्रा को प्रैक्टिकल में 200 में 176 अंक (88 फीसदी) मिले थे। यानी छात्रा का कुल प्रतिशत 59.6 फीसदी रहा। अब जब छात्रा का द्वितीय वर्ष का परिणाम आया तो सभी चौंक गए। छात्रा ने द्वितीय वर्ष में 88 फीसदी अंक हासिल कर विश्वविद्यालय की मेरिट लिस्ट में तीसरा स्थान प्राप्त किया। इस बार छात्रा को लिखित परीक्षा में 69, 75, 70, 68 व 70 (88 फीसदी) अंक मिले। सभी प्रश्नपत्र 80 अंक के थे। इसी तरह प्रैक्टिकल परीक्षा में भी 88 फीसदी अंक मिले। यानि पिछले वर्ष की लिखित परीक्षा की तुलना में छात्रा ने 43 फीसदी की वृद्वि की, यही नहीं छात्रा का नाम विश्वविद्यालय की मेरिट सूची में तीसरा स्थान आ गया।जुलोजी में इतने अधिक नंबर मिलने पर कई सवाल उठने लगे हैं। इसको लेकर कुछ लोगों ने कुलपति, रजिस्ट्रार से लेकर राज्यपाल तक शिकायत करते हुए दोबारा मूल्यांकन की मांग की है। शिकायत पत्र में आरोप लगाया गया है कि मूल्यांकन के दौरान छात्रों की श्रेणी सुधारने के लिए कर्मचारी खेल कर रहे हैं। इसी खेल के चलते इस छात्रा के इतने अधिक अंक आए हैं।
रजिस्ट्रार आरसी अवस्थी ने बताया कि मामले की जानकारी मिली है। कुछ लोगों ने शिकायत पत्र दिया है। इसकी जांच कराई जा रही है और अगर कोई दोषी पाया गया तो उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी। विश्वविद्यालय की पारदर्शिता पर उठने वाले सवाल को गंभीरता से लिया गया है। हालांकि विश्वविद्यालय परीक्षाओं की कापियां जांचने में कोडिंग की व्यवस्था की है, अब देखना यह होगा कि छात्रा के नंबर वास्तविक हैं या विश्वविद्यालय की तरफ से कहीं गड़बड़ी हुई है। बताते चलें कि पूरे मामले की जांच विश्वविद्यालय कर रहा है, इसलिए छात्रा का नाम नहीं दिया जा रहा है।

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