Saturday , 21 April 2018
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हेल्थ डे पर खुली पोल हैलट में इलाज से पहले मिलती है मार-मरीजों को ले जाते तमीरदार

हेल्थ डे पर खुली पोल हैलट में इलाज से पहले मिलती है मार-मरीजों को ले जाते तमीरदार

06aकानपुर। चिकित्सा शिक्षा प्रमुख सचिव अनूप पाण्डेय ने दो दिन पहले ही हैलट अस्पताल का निरीक्षण किया और मरीजों के प्रति हैवानियत नहीं बल्कि एक मरीज और डाक्टर जैसा व्यवहार करने की नसीहत दी, लेकिन वल्र्ड हेल्थ डे के शुभ अवसर पर जब मरीजों का हाल जाने के लिए हैलट अस्पताल पहंुचे तोउनकी बातें सुनकर आपके आंखो में भी आंसू आ जायेंगे हालचाल पूछने पर कुछ मरीजों ने यहां तक कह दिया कि यहां पर इलाज से पहले मार मिलती है, लेकिन मारने वालें डाक्टरों के आंखो में आंसू नहीं हैवानियत देखी जाती है। यहां के डाक्टर इसलिए भी ऐसा करते है कि पूरे प्रदेश के अस्पतालों के डाक्टरजब अपने हाथ खड़े कर देते है तब उन मरीजों को हैलट के लिए भेजा जाता है और काम का अधिक बोझ हो जाने पर वह ऐसा व्यवहार करने पर मजबूर हो जाते है।

मरीजों को सही समय पर नहीं मिलता स्ट्रेचर

मेडिकल कालेज से सम्बद्ध हैलट अस्पताल में अगर कोई मरीज इलाज के लिए बाहर से आता है तो यहां पर तुरंत उसे स्ट्रेचर नहीं मिला पाता। इस पर तीमारदार मरीज को कंधे पर ले जाते है या तो गोदी पर ले जाने के लिए मजबूर होते है। वहीं वार्ड मंे अगर स्टेªचर तीमारदार लेना भी चाहे तो वहां की स्टाफनर्स पचास रुपये शुल्क मांगती है। जब अस्पताल में इलाज के लिए स्ट्रेचर नहीं मिलता है तो समझ लिजिये कि यहां की इलाज की व्यवस्था क्या होगी।

इनका दर्द देख भगवान के आखांे से छलक आयंेगें आंसू

बताते चले कि हैलट अस्पताल के डाक्टरों की सवेदनहिनता की बात करें  तो दिन क्या एक साल भी काम पड़ जाए । लेकिन यह सवंेदनहिनता करने वाले डाक्टर अपनी आदत सुधाराने में बाज नहीं आ रहे है। आये दिन मरीजों से मारपीट कर रहे डाक्टरों के रवैये को अगर कहीं भगवान देख ले तो उनकेआंखो में भी आंसू आ जायेंगे लेकिन धरती के भगवान  रहम नहीं खाते।

बीते दिनों हुए अस्पताल में यह कांड

जुही लाल कॉलोनी अम्बेडकर नगर का निवासी अली अहमद आंत की समस्या होने पर घरवालों ने इलाज के लिए हैलट अस्पताल में भर्ती किया। जहां इनका इलाज डाक्टर अनुराग सिंह कर रहे थे। परिवार की माने तो डाक्टर ने मरीज का आपेरशन किया और टांके न लगाकर पट्टी बांध दिया। पेट में टांके नलगने के कारण मरीज को इंफेक्शन हो गया और उसकी इलाज के दौरान मौत हो गयी। वहीं जूनियर डाक्टरों ने कुछ दिन पहले ही एक वृद्धा को इलाज न करते हुए एम्बुलेंस कर्मचारियों की मदद से उसे गंगा बैराज फिकवा दिया था। एडीएम सिटी की जांच में दोषी पाए जाने वाले जूनियर डाक्टरों कोप्रधानाचार्य नवनीत कुमार ने निलबिंत कर दिया हैं ऐसे कई घटनाएं है जिसको बताते अखबार का पन्ना भर जायेगा लेकिन डाक्टरों की शिकायते कम नहीं होगी।

चिकित्सा व्यवस्था के लिए प्रदेश में 45 सौ करोड़ का बजट

गरीब परिवार को इलाज और जांच के सुविधाओं को देने के लिए सूबे की सरकार ने प्रदेश के चिकित्सा व्यवस्था बिगड़ी चाल को पटरी पर लाने के लिए इस साल 45.72 सौ करोड रुपये का बजट रखा है। पिछले बजट के अनुसार इस साल 2015-2016 में 17 सौ करोड़ रुपये चिकित्सा सुविधा के लिए अधिकहै। इसके अलावा मुख्य्मंत्री ने सावर्जनिक चिकित्सा सेवाओं पर विशेष जोर दिया है। गरीब, लो-इनकम और मिडल क्लास फैमिली के लिए क्वालिटी मेडिकल सर्विसेस फ्री या नॉमिनल फीस पर अवेलेबल करवाने का प्रावधान इस साल के बजट में रखा है। इसके बावजूद सरकारी अस्पतालों की हालतखस्ता है।

क्या कहते है अधिकारी

हेल्थ डे के अवसर व डाक्टरों की करतूतों के बारे में जब प्राचार्य से पूछतांछ की तो उन्होंने फोन रिसीव नहीं किया। जब अस्पताल प्रबंधन से पूछतांछ की गयी तो उन्होंने अखबार में नाम न छपने की शर्त पर बताया कि मेडिकल कालेज कानपुर में सबसे बड़ा है यहां पर कई जिलों से ऐसे मरीज आते है जिनकीजीने की आशा कम होती है और तब डाक्टर उन्हें अपने अस्पताल से हटाकर हैलट भेज देते है। यहां पर मरीजों की अधिक संख्या व डाक्टरों की कमी होने के कारण जूनियर डाक्टर्स दो दिन ड्यूटी करते है। निरंतर ड्यूटी करने से डाक्टरों के भीतर चिड़चिड़ापन हो जाता है जिसके लिए वह ऐसा व्यवहार करबैठते है। मरीजों के प्रति की गयी लापारवाही के चलते अस्पताल प्रबधंन उनपर कारवाई भी करता है।

 

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