Monday , 15 August 2022
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इस्लामी वातावरण में उच्च शिक्षा जल्द -हक़ फाउंडेशन के दस्तारबंदी जलसे में घोषणा

इस्लामी वातावरण में उच्च शिक्षा जल्द -हक़ फाउंडेशन के दस्तारबंदी जलसे में घोषणा

01abu obaida कानपुर।  हक़ एजुकेशन एण्ड रिसर्च फाउंडेशन का दीक्षांत समारोह पुरस्कार वितरण और दस्तारबंदी  इस्लाम का संदेश मानवता के नाम  के शीर्षक से रागेन्द्र स्वरूप सभागार में आयोजित हुआ। संस्था से चौथे बैच के 21 छात्रों को पुरस्कार वितरित किए गए और संस्था में स्थापित डे बोर्डिंग तहफीजुल कुरआन से पूरा कुरआन याद करने वाले 5 छात्रों के सिर पर दस्तार बांधी गई। जलसे में आये उलमा ने किमती और उपयोगी बातों से लोगों को लाभान्वित किया। भिवंडी महाराष्ट्र से आए मौलाना सैयद मुहम्मद तलहा क़ासमी नक्शबंदी ने कहा कि भाषा दुनिया की कोई भी हो वह भाषा के रूप में बुरी नहीं होती। भाषाओं की भिन्नता अल्लाह की प्रकृति की निशानी  है। कुरआन में जहाँ विभिन्न भाषाओं को अपनी प्रकृति की निशानियों  में वर्णित किया है इससे पहले अपनी प्रकृति की कई निशानियों  का वर्णन किया हैं। अल्लाह ने अपनी शक्ति का वर्णन करने का लक्ष्य भी बयान फ़रमाया कि हम इस पर विचार विमर्श करें। अल्लाह ने अपनी कुदरत  की निशानियों  का उल्लेख करते हुए कहा कि अल्लाह ने दिन व रात बनाए सुबह व शाम बनाए जिसमें सर्वाधिक परिवर्तन होता हैं। अल्लाह ने रात बनाई जिससे आजीविका कमाने के लिए शक्ति व ताज़गी प्राप्त होती है अल्लाह तआला का कोई काम लक्ष्य से खाली नहीं है। अल्लाह के किसी काम में कोई कोताही और कमी नहीं होती। अगर हमारे समझ में नहीं आती तो यह हमारी बुद्धि की कमी और दोष है। इस ब्रह्मांड में समानता नहीं है। प्रकृति को करीब से देखने के लिए दिन और रात के परिवर्तन को हम रोज देखते हैं। कोई भी दौर और परिवर्तन निरर्थक नहीं है। मनुष्य को मर कर अल्लाह के पास जाना है वे इसकी चिंता करे और अपने भीतर आखिरत की चिंता पैदा करें। अल्लाह ने इंसानों को मिट्टी से पैदा किया और उनके सुकून के लिए उनमें पत्नी पैदा की यह भी अल्लाह की प्रकृति की निशानी  है। इस्लाम ने गंदगी से घृणा करने की शिक्षा दी है लेकिन जिसके अंदर गंदगी है उससे घृणा नहीं बल्कि उसे सहानुभूति के साथ समझाने की जरूरत है। मनुष्य को जीवित रखने के लिए पेड़ पहाड़ खेतियां  बनाईं। महिलाओं के बाहर निकलने से इंसानों का परिवार प्रणाली नष्ट हो गया। शक्ति का सही इस्तेमाल तभी हो सकता है जब घर के काम महिलाओं और बाहर काम बाहर पुरुषों के सुपुर्द किया जाये। हमें अपनी बुद्धि का सही उपयोग करने की आवश्यकता है। मौलाना ने अंग्रेजी भाषा का उलमा के विरोध के संबंध में बात करते हुए कहा कि विभिन्न भाषाएँ कुदरत की देन हैं इसका विरोध नहीं किया गया बल्कि इसके साथ आने वाली पश्चिमी सभ्यता की सोच और विचार का विरोध किया था। जिसमें अधार्मिकता बेहयाई और नग्नता थी । भाई-चारा व परिवार प्रणाली को बर्बाद करने की सोच लेकर अंग्रेज भारत को यहां के रहने वालों को गुलाम बनाने के लिए आए थे। हमारे उलमा ने इसको महसूस किया इस लिए सख्ती से इसका विरोध किया ताकि वह हमारी सभ्यता  संस्कृति और आदर्शाें को न बिगाड़ सकें लेकिन आज जब बिगाड़ बनाने में अंग्रेज सफल हो गए हमारे घरों को आग लग गई तो उससे बचाव हमारे लिए आवश्यक है । इसलिए उन्हीं लोगों ने जो पहले इसका विरोध करते थे उन्हों ने  समाज को सुधारने और इस्लाम धर्म को बढ़ावा देने के लिए अंग्रेजी शिक्षा देने वाले संस्थान स्थापित किए। मौलाना ने कहा कि अंग्रेजी को दावत व तबलीग और इस्लाम के प्रति संदेह को रद करने के लिए सीखें। अल्लाह ने नबियों को उनके क़ोमों की भाषा में प्रचार के लिए भेजा। आज दुनिया में अंग्रेजी भाषा विष्वस्तर की भाषा बन चुकी है इसलिए इसे उलमा ने सीखा है इसका उपयोग धर्म की सेवा में करें। अल्लाह ने मनुष्य को अलग भाषाएँ दी है। भाषाओं पर उसके समाज के वातावरण का असर होता है समाज के सुधार के साथ मुहावरों के अर्थ भी बदल जाते हैं इसलिए हूजूर स.अ.व. ने आने के बाद सबसे पहले समाज के वातावरण को बदला  जब अंग्रेज यहां आए थे तो वह केवल यहां की जमीन पर कब्जा नहीं किया बल्कि यहां के लोगों के दिल व दिमाग में क़ब्ज़ा किया। ज्ञान का अधिग्रहण किसी भाषा पर निर्भर नहीं है। उद्योग के क्षेत्र में सबसे अधिक विकसित जापान ब्रिटेन और फ्रांस हैं लेकिन उन्हें इंग्लिश से नफ़रत है। इसलिए हम हीन भावना से ग्रस्त न हों। मौलाना ने खत्म होने वाले छात्रों को नसीहत देते हुए कहा कि हमे अंग्रेजी दावत की ज़रूरत के लिए प्राप्त करते हैं। हमारे लिए आवश्यक है कि हम अल्लाह का संदेश इंसानों के बीच उनकी ही भाषा में पहुंचाएं। अल्लाह जरूरतें पूरी करेगा। जो लोग अधिक माल कमाना चाहते हैं कि वे वास्तव में नश्वर संसार को स्वर्ग(जन्नत) बनाना चाहते हैं। लेकिन जिस तरह रेत पर घर नहीं बनाया जा सकता उसी तरह इस दुनिया में स्वर्ग(जन्नत) नहीं बनाई जा सकती है।
हक़ एजुकेषन के संस्थापक और चेयरमैन मौलाना मुहम्मद मतीनुल हक़ उसामा क़ासमी कार्यवाहक काजी ए शहर कानपुर ने कहा कि मुसलमानों की बतौर उम्मत ज़िम्मेदारी है कि वे जिस क्षेत्र में है कि वहां की संस्कृति पारिवारिक प्रणाली अमीरी-गरीबी स्तर से लाभ-हानि की जानकारी रखें क्योंकि अल्लाह ने रसूल अल्लाह स.अ.व. की उम्मत को नबी द्वारा किये गये कामों को भी सौंपा है। आप स0अ0व0 ने जो नमूना छोड़ा है उस पर अमल करके हम दुनिया और आखिरत दोनों बना सकते हैं मौलाना ने कहा कि आज जो दुनिया में संघर्ष है वह धर्म के आधार पर कम, लेकिन सभ्यता व संस्कृति के आधार पर अधिक है। आज दुनिया इस्लामी संस्कृति को खत्म करने पर आमादा है। मौलाना ने ट्रेड सेन्टर पर हमला करते समय अमेरिका के राष्ट्रपति बुश के भाषण का हवाला देते हुए कहा कि उसने उसी समय कहा था कि जब तक दाढ़ी और बुर्का रहेगा तब तक लड़ाई जारी रहेगी। मौलाना ने कहा कि इस्लामी सभ्यता और संस्कृति के महत्व को रूस के पूर्व राष्ट्रपति गुरबाचैफ ने भी महसूस किया था। उसने अपने विचारों को व्यक्त करते हुए कहा था कि अगर शांति चाहते हो तो इस्लामी परिवार व्यवस्था को अपना लो। आज मीडिया का इस्तेमाल इस्लाम के खिलाफ किया जा रहा और आपत्तियां (एतराज़) अंग्रेजी में की जा रही हैं दुनिया की स्थिति को सामने रखकर इस्लाम धर्म को पहुंचाना समय का जरूरत है। हमें अपने चरित्र को पेश करने की ज़रूरत है, कानपुर ज्ञान का शहर है। अब धर्म की लड़ाई कम सभ्यता की लड़ाई अधिक है। दुनिया चाहती है कि हम मुसलमान रहें लेकिन वह मुसलमान दिखें नहीं ।  अंत में मौलाना उसामा क़ासमी ने शहर में एक ऐसा स्कूल स्थापित करने की घोषणा की जहां इस्लामी वातावरण में इंग्लिश मीडियम से उच्च शिक्षा दी जाएगी जल्दी ही एक मानकस्तर पर कोचिंग सेंटर खोलने की भी घोषणा की।

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