Monday , 16 December 2019
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लोकतंत्र में ऐसा नहीं होता

लोकतंत्र में ऐसा नहीं होता

abu obaida 98380 33331 लखनऊ । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ८ नवम्बर की शाम पांच सौ और हज़ार के नोटों के चलन को बन्द करके यक़ीनन एक ऐतिहासिक फैसला किया।अचानक हुए इस आदेश से देश भर में हाहाकार मच गया। सभी लोग सड़कों पर आगये और पहली कोशिश में अपनी जेब में रखे ५०० और हज़ार के नोटों को बाजार में चलाने को बेताब दिखे लेकिन सूचना क्रान्ति के इस दौर में कुछ ही देर में बच्चे बच्चे को ये मालूम होगया कि सौ रूपये से ऊपर भारतीय मुद्रा चलन से बाहर हो चुकी है। लिहाज़ा दुकानदारों ने सौ से ऊपर के नोटों को लेने से इनकार करना शुरू किया और हालात झगड़े तक पहुँच गए। सब से ज़्यादा परेशानी उन लोगों को हुई जो सफर में थे और उन्हें आदेश की जानकारी ही नहीं हुई। ट्रेन और बसों में सफर कर रहे भूखे लोगों को जब वेंडरों ने बड़े नोटों के बदले खाने पीने की चीज़ें देने से मना किया तो उनके तोते उड़ गए और  भूखे पेट सफर पूरा कर घर तक पहुंचे।
किसी तरह सुबह हुई तो आम लोगों को बच्चों के दूध ब्रेड ,साबुन तेल ,आटा , दाल ,चावल घी दवाइयां अदि के लिए दर दर भटकना पड़ा। जिनके पास सौ रूपये या उससे छोटे पैसे थे वह तो खरिदारी करने में कामयाब होगये लेकिन लाखों करोड़ों लोग दिन भर परेशान हलाकान होने के बाद १० नवम्बर को मुद्रा बदलने बैंक पहुंचे तो लंबी लंबी लेने देख चकरा गए। बड़ी मुश्किल से लोगों को पुराने नोटों के बदले नए नोट मिले तो उन्हों ने राहत की सांस ली। यह तो हुई आम आदमी की बात जिसने किसी तरह अपनी गाडी को खींचा।
हैरत और मज़े की बात तो यह रही कि सोशल मीडिया और मेनस्ट्रीम मीडिया में नरेंद्र मोदी के इस आदेश पर किसी तरह का बवाल नहीं खड़ा हुआ जिससे विपक्ष के नेताओं को बल नहीं मिल पाया और कुछ एक स्थानों पर पुतला जलाने के अलावा खास प्रतिक्रया नहीं हुई यही कारण है कि देश भर में कहीं भी किसी गड़बड़ी की ख़बरें नही आयीं।
लेकिन दो दिन बर्दाश्त करने के बाद यूपी में कुछ सियासी पार्टियों के नेता प्रेस कांफ्रेंस कर मोदी के इस आदेश को तुगलकी फरमान बता रहे हैं।बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष मायावती ने लखनऊ में संवाददाता सम्मलेन में कहा कि यह हड़बड़ी में लिया गया फैसला है जो जन विरोधी है ऐसे ही कुछ खयालात समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव के भी रहे जिन्हों ने इसे गलत बताया।
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद ने कहा कि लोक तन्त्र में ऐसा नहीं होता।
इतने बड़े नेताओं के मीडिया में ब्यान देने के बावजूद जनता का समर्थन न मिलना इस बात का सबूत है कि लोग भ्रष्टाचार का खात्मा चाहते हैं भले ही उन्हें कुछ या यूँ कहें कि भारी  दिक्कतों का सामना ही क्यों न करना पड़े। पब्लिक जानती ही कि उनकी गाढ़ी कमाई से राजनीतिक पार्टियां अपनी तिजोरियां भर्ती हैं और घोटालों से  नाजायज़ कमाई को हमेशा के लिए स्विस बैंकों में दफन कर मौज उड़ाती हैं।
नेताओं की फड़फड़ाहट पर आम जनता का कहना है कि लोकतंत्र के नाम पर महलों में बैठे राजा रुपी नेता आम लोगों को कीड़ा मकोड़ा समझते हैं और चुनाव आते ही उड़नखटोलों में सवार होकर वोट की भीख मांगने निकल पड़ते हैं। उत्तर प्रदेश की बात करें तो लोग यहां हुए दंगों के दंश को अभी भूल नहीं पाए। दादरी में इख़लाक़ की ह्त्या हो ,मुज़फ्फर नगर में हुआ देश का  सब से बड़ा नरसंहार हो नरसंहार के बाद सैफई में बालाओं का नंगा नाच और हज़ारों करोड़ का खर्च  ,गौ रक्षकों का जुल्म  हो या दलितों की गौ रखा के नाम पर निर्मम पिटाई लोगों को सब याद है। देश और जनता पूछ रही है कि देश  में हुई गैर इंसानी वारदातें को  भारतीय लोकतंत्र मान्यता देता है। यह एक यक्ष प्रश्न है जिसका जवाब देने के बजाये भ्र्ष्टाचार और लूटमार में लिप्त नेता जनता को उकसा कर देश का माहौल खराब करना चाहते हैं।हालांकि सियासी जमातों की यह चाल कामयाब होते दिख नहीं रही।
कुल मिलाकर काले धन को तिजोरियों से बाहर निकालने में रिज़र्व बैंक कामयाब  हो चुका है और नतीजे में नेताओं ,ब्यूरोक्रेट्स ,सरकारी बाबुओं और खून चूसने वाले व्यापारियों का हज़ारों करोड़ रद्दी में भी नहीं बिकने वाला।

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