Saturday , 25 September 2021
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मुस्लिम इलाक़ों में चौराहों की सूरत बदलने लगी -उपसभापति हाजी सुहैल की कोशिशें रंग लाईं।

मुस्लिम इलाक़ों में चौराहों की सूरत बदलने लगी -उपसभापति हाजी सुहैल की कोशिशें रंग लाईं।

04 Aabu obaida कानपुर। मुस्लिम बाहुल्य इलाक़ों में अब चौराहों की सूरत बदलने लगी है।चौराहे के बीच ट्रैफिक सिपाही के खड़े होने वाले आइलैंड पर परम्परागत गोल छत की जगह अब अल्लाह और उसके नबी मोहम्मद सअव का नाम रंग बिरंगी रोशनी से जगमगा रहा है। दलेल पुरवा चौराहा अब मौलाना हसरत मोहानी के नाम से याद किया जाएगा वहीँ तिकुनिया पुरवा चौराहे को अल्लामा इकबाल का नाम मिले गा। हलीम कालेज चौराहा वैसे तो हलीम कालेज के संस्थापक हलीम साहब के ही नाम से जाना जाता था लेकिन अब वहाँ एक विशाल मीनार बन रही है जिस पर बाक़ायदा हाफ़िज़ हलीम साहब के नाम का पत्थर लगाया जाचुका है जब की मीनार की फिनिशिंग का कार्य प्रगति पर है जिसमे प्लास्टर के बाद टाइल्स और लाइटें लगाईं जाएँ गी। इतना ही नहीं रहमानी मार्किट तिराहे को अब मरहूम एमएलए बाबू बदरे के नाम से लोग जाने गे।रूपम चौराहे से सीसामऊ चौराहे तक की सड़क पूर्व मंत्री अब्दुर्रहमान खान नश्तर साहब के नाम से जानी जायेगी।
इन सब में रूपम चौराहे को ख़ास तवज्जोह मिल रही है क्यूंकि यह शायद पूरे भारत में अपने आप में नया प्रयोग है जिसपर चारों तरफ अल्लाह और उसके नबी का नाम न्यूनसाइन बोर्ड के ज़रिये लोगों को अपनी और आकर्षित कर रहा है।रूपम चौराहा अब हमीद खां जिन्हे लोग अदब से ताऊ जी बुलाते थे के नाम से याद किया जाने लगा है। बतादें कि अंग्रेज़ों से लोहा लेने वाले जुझारू नेता हमीद खां कानपुर में पहले एमएलए हुए जिन्हे जनता ने दोबार १९५२-१९५७ और १९६२ से १९६७ तक सदन तक पहुंचाया। टोपियां सीकर और चरखा कात कर अपनी जीविका चलाने वाले गरीब परिवार के ताउजी आज भी  लोगों के दिलों में ज़िंदा हैं।
ऊपर जिन चौराहों के नामकरण का ज़िक्र हुआ वह सभी भारत की आज़ादी के नायकों में से हैं जिन्हे मुस्लिम क़ौम सिर्फ छोटे मोटे सेमिनारों में याद करती है। नई पीढ़ी तो शायद उन्हें भुला ही बैठी है लेकिन समाजसेवा का असली जज़्बा दिल मे रखने वाले कानपुर नगर नैगम के उपसभापति हाजी सुहैल अहमद खान मुस्लिम समाज के इन महापुरुषों के नाम को अगली पीढ़ी तक पहुँचाने के लिए जो कोशिशें मात्र दो साल में कर दिखायीं वह ७० साल में कोई नहीं कर पाया। नेताओं ने बड़े बड़े वायदे किये पर सभी  ने भी इन चौराहों या सड़कों को उपेक्षित ही रखा जबकि शहर के अन्य मोहल्लों में सूरतेहाल दूसरी है और कई चौराहे आज़ादी के नायकों के नाम से जाने जाते हैं।हाजी सुहैल कहते हैं कि उनकी कोशिश है कि हिन्दुस्तान की आज़ादी में अन्य क़ौमों के साथ साथ अपना बहुमूल्य योगदान देने वाले मुस्लिम क्रांतिकारी अब लोगों के ज़ेहनों में ताज़ा रहेंगे।

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