Monday , 22 July 2019
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बरेलवी देवबंदी इत्तेहाद से मुस्लिम मुखालिफ तंजीमे बेचैन

बरेलवी देवबंदी इत्तेहाद से मुस्लिम मुखालिफ तंजीमे बेचैन

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अबु उबैदा

कानपुर।हाल ही में देवबंद में बेगुनाह मुस्लिम नवजवानों को आतंकवाद के नाम पर जबरन जेलों में ठूंसे जाने के बाद मिल्ली  इत्तेहाद के मद्देनज़र आलाहज़रत तौकीर रज़ा खां साहब के दारुलउलूम देवबंद दौरे से जहां आम मुसलमानो में ख़ुशी की लहर है वही मुस्लिम दुश्मन तंज़ीमों में खलबली मची हुई है।बरेली से  किसी भी धर्म गुरु के पहली बार इस तरह देवबंद पहुँचने पर आम मुसलमानो ने अपनी ख़ुशी का इज़हार करते हुए कहा कि यह काम तो सालों पहले ही होजाना चाहिए था वहीँ मुसलमानो का पढ़ा लिखा तबका जो मुसलसल फिरकों को भूल मुसलमानो के आपसी इत्तेहाद की बात करता था वह  खुश है। मुस्लिम  फेडरेशन के सरपरस्त हाजी मोहम्मद सलीस व बुद्धिजीवी डाक़्टर इशरत सिद्दीकी ने अपने संयुक्त बयान में मौलाना तौकीर रज़ा की इस ख़ास पहल का दिल से स्वागत किया है। हाजी सलीस व डा. इशरत सिद्दीकी ने अपने संयुक्त बयान में कहा कि बरेली और देवबंद  विचारों को आपस में मिलने की कभी कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था लेकिन तौकीर रज़ा ने मुसलमानो की भलाई के लिए उसपर विराम लगा दिया हालांकि मौलाना के इस क़दम पर शहर के उल्मा अभी खामोश हैं और कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। डाक़्टर इशरत सिद्दीकी ने बताया कि 24 नवंबर  2004 को सैयद आमीन मियाँ व सैयद नजीब मियाँ ने एक प्रेस कांफ्रेंस के माध्यम से अपील की थी बरेलवी और देवबंदी की फ़ाइल को बंद कर मुसलमानो में आपसी भाईचारे और मिलाप की कोशिशें की जानी चाहिए हालांकि उनकी इस अपील पर आम मौलवी ने कोई तवज्जोह नहीं दी और सब अपने अपने मसलकों को अच्छा बताकर एक दुसरे को काफिर ही बताते रहे और यह सिलसिला अभी जारी है जबकि आरएसएस जैसा संगठन मुसलमानो को अलग अलग फिरकों में बांटने की लगातार कोशिशों में लगा है।हाजी सलीस ने तो यहाँ तक आरोप लगाया कि पिछले दिनों दिली में आयोजित सूफी कांफ्रेंस आरएसएस के फंड से हुई थी। उन्हों ने  कहा कि मौलाना तौकीर बरेली शरीफ के पहले खनवादे हैं जिन्हों ने अपनी कटटर सोच को पीछे छोड़ मुसलमानो के हक़ीक़ी मसायल को देखते हुए दोस्ती का हाथ बढ़ाया है जोकि क़ाबिले तारीफ़ है।
मुसलिम मामलों  के जानकार और जाने माने साहित्य्कार डाक़्टर इशरत सिद्दीकी ने कहा कि आज पढ़े लिखे मुस्लिम नौजवानों को एनकाउंटर में मारे जाने  की साज़िशें चल रही हैं और बटला हाउस एनकाउंटर इसका जीता जागता सबूत है। सिद्दीकी कहते हैं कि आज किसी  भी मुस्लिम युवक को पुलिस और देश की अन्य एजेंसियां बिना सबूत आतंकवाद के नाम पर उठा कर जेलों में ठूंस देती हैं और वह जेल  में सालों मुसिबतें झेल कर अदालत द्वारा बा इज़्ज़त बरी कर दिया जाता है। उनका मानना है कि मुसलमानो के एक मंच पर आने से न सिर्फ क़ौम की सामजिक स्थिति बेहतर होगी बल्कि सियासी तौर पर भी वह मज़बूत होंगे।
सत्यम न्यूज़  ने जब मुस्लिम इलाकों में दौरा किया और तौकीर रज़ा साहब के देवबंद दौरे पर प्रतिक्रया जाननी चाहि तो सैकड़ों लोगों ने एक ही जवाब दिया कि जब अल्लाह एक क़ुरआन एक आखरी नबी की सुन्नतें एक तो मुसलमान अलग अलग क्यों। लोगों ने कहा कि मुस्लिम क़ौम की सुरक्षा खुशहाली और तरक़्क़ी के लिए शिया सुन्नी देवबंदी सभी को एक ही मंच पर आना चाहिए और यह वक़्त का तक़ाज़ा है। लोगों ने कहा कि ज़रूरी नहीं कि मुसलमान अपने मसलक को छोड़ दे बल्कि ज़रूरी है कि अपने मसलक पर रहते हुए आपस में एकता कायम करे और यह कोई मुश्किल काम नहीं। लोगों ने कहा कि सभी मस्जिदों में नमाज़ का एक ही तरीका है हज के लिए एक ही सिस्टम है फिर फिरकों की क्या ज़रुरत। आम लोग तो  चाहते है कि मुस्लिम धर्मगुरु सिर्फ एक अल्लाह और एक क़ुरआन की बात करें ताकि मुसलमानो को हिन्दुस्तान में अपना एक रहनुमा मिलसके और वह देश के सियासी पटल पर अपना खुद का परचम लहराएं।

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